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Monday, 17th June 2019
   
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धर्म संसार

देशभर की इन जगहों में कुछ खास तरीके से मनाई जाती है होली

पूरे देशभर में होली के पर्व का धूम देखने को मिल रही है। होली का त्यौहार बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है। इस त्यौहार में रंगो का खास महत्व है। भारत के विभिन्न-विभिन्न हिस्सों में होली का त्यौहार मनाया जाता है लेकिन इन्हें मनाने के सब के रीति-रिवाज भी अलग-अलग हैं। तो आईए जानते हैं, देश के उन हिस्सों के बारे में जहां होली को बड़े ही विचित्र तरीकों से मनाया जाता है।

 
उत्तर प्रदेश में ब्रज की बरसाने की ‘लट्ठमार होली’ अपने आप में अनोखी और विश्व प्रसिद्ध है, जिसका आनंद लेने के लिए लोग दूर-दूर से आते हैं। यहां होली खेलने के लिए रंगों के स्थान पर लाठियों व लोहे तथा चमड़े की ढालों का प्रयोग किया जाता है। महिलाएं लाठियों से पुरुषों को पीटने का प्रयास करती हैं जबकि पुरुष ढालों की आड़ में स्वयं को लाठियों के प्रहारों से बचाते हैं। लट्ठमार होली का आयोजन ब्रज मंडल में करीब डेढ़ माह तक चलते हैं लेकिन विशेष आयोजन के रूप में खेली जाने वाली लट्ठमार होली के लिए विभिन्न दिन एवं स्थान निश्चित हैं। ब्रज मंडल में नंदगांव, बरसाना, मथुरा, गोकुल, लोहबन तथा बलदेव की लट्ठमार होली विशेष रूप से प्रसिद्ध व दर्शनीय है। 
 
बिहार में कुछ स्थानों पर रात के समय होली जलाने की प्रथा है। लोग होलिका दहन के समय आग के चारों ओर एकत्रित होते हैं और गेहूं व चने की बालें भूनकर खाते हैं। प्रदेश के कुछ हिस्सों में युवक अपने-अपने गांव की सीमा के बाहर मशाल जलाकर रास्ता रोशन करते हैं। इस संबंध में मान्यता है कि ऐसा करके वे अपने गांव से दुर्भाग्य और संकटों को दूर भगाते हैं।
 
पश्चिम बंगाल में होली का आयोजन तीन दिन तक चलता है, जिसे ‘डोलीजागा’ नाम से जाना जाता है। भगवान श्रीकृष्ण के मंदिरों के आस-पास कागज, कपड़े व बांस से मनुष्य की प्रतिमाएं बनाई जाती हैं और छोटी-छोटी पर्णकुटियों का भी निर्माण किया जाता है। शाम के समय मनुष्य की प्रतिमाओं के समक्ष वैदिक रीति से यज्ञ किए जाते हैं और यज्ञ कुंड में मनुष्य की प्रतिमाएं जला दी जाती हैं। उसके बाद लोग हाथों में भगवान श्रीकृष्ण की प्रतिमाएं लेकर यज्ञ कुंड की सात बार परिक्रमा करते हैं। अगले दिन प्रात: भगवान श्रीकृष्ण की प्रतिमा को एक झूले पर सजाया जाता है और पुरोहित मंत्रोच्चार के साथ उसे झूला झुलाता है। इस दौरान वहां उपस्थित लोग भगवान श्रीकृष्ण की प्रतिमा पर अबीर-गुलाल उड़ाते हैं। विधिवत पूजा अर्चना के बाद पुरोहित उस अबीर-गुलाल को उठाकर उसी से वहां उपस्थित लोगों के मस्तक पर टीका लगाता है। इसके बाद दिनभर लोग रंगों से आपस में होली खेलते हैं।
 
पंजाब में भी हरियाणा की ही भांति होली पर खूब धूमधाम और मस्ती देखी जाती है। लोग रंग और गुलाल से होली खेलकर एक-दूसरे से गले मिलते हैं। महिलाएं होली के दिन अपने घर के दरवाजे पर ‘स्वास्तिक’ चिन्ह बनाती हैं। शाम को जगह-जगह कुश्ती के दंगल और शारीरिक सौष्ठव के आयोजन होते हैं।
 
हरियाणा कृषि प्रधान राज्य में होली के इंद्रधनुषी रंगों की छटा देखते ही बनती है। होली के दिन महिलाएं व्रत रखती हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाएं पारंपरिक लोकगीत गाते हुए समूहों में होलिका दहन के लिए जाती हैं और पूजा अर्चना करती हैं तथा होलिका दहन के पश्चात व्रत खोलती हैं। यहां होली की आग में गेहूं तथा चने की बालें भूनकर खाना शुभ माना जाता है। शाम को गांवों में कबड्डी व कुश्ती प्रतियोगिताएं भी आयोजित होती हैं। महिलाएं शाम के समय अपने लोक देवता की पूजा के लिए मंदिरों में जाती हैं और प्रसाद बांटती हैं।
 
हिमाचल प्रदेश में होलिका दहन के पश्चात् बची हुई राख को ‘जादू की शक्ति’ माना जाता है और यह सोचकर इसे खेत-खलिहानों में डाला जाता है कि इससे यहां किसी प्रकार की विपत्ति नहीं आएगी और फसल अच्छी होगी। 
 
गुजरात में होली का पर्व ‘हुलासनी’ के नाम से मनाया जाता है। होलिका का पुतला बनाकर उसका जुलूस निकाला जाता है और होलिका के पुतले को केन्द्रित कर लोग तरह-तरह के हंसी-मजाक भी करते हैं। उसके बाद पुतले को जला दिया जाता है और होलिका दहन के बाद बची हुई राख से कुंवारी लड़कियां ‘अम्बा देवी’ की प्रतिमाएं बनाकर गुलाब तथा अन्य रंग-बिरंगे फूलों से उनकी पूजा-अर्चना करती हैं। ऐसा माना जाता है कि ऐसा करने से लड़कियों को मनचाहे वर की प्राप्ति होती है।
 
महाराष्ट्र में होली का त्यौहार ‘शिमगा’ नाम से मनाया जाता है। यहां इस दिन घरों में झाड़ू का पूजन करना शुभ माना गया है। पूजन के पश्चात् झाड़ू को जला दिया जाता है। प्रदेश के अधिकांश हिस्सों में होली खेलते समय पुरुष ही रंगों का इस्तेमाल करते हैं। दक्षिण भारत के राज्यों में मान्यता है कि भगवान शिव ने इसी दिन कामदेव को अपने गुस्से से भस्म कर दिया था, इसलिए यहां होली पर्व कामदेव की स्मृति में ‘कामदहन पर्व’ के रूप में ही मनाया जाता है।
 
रणबांकुरों की धरती में तो होली का अलग-अलग जगह अलग-अलग तरीके से आयोजन होता है। जयपुर के आस-पास के कुछ क्षेत्रों में होलिका दहन के साथ पतंग जलाने की भी प्रथा है। गौरतलब है कि यहां पतंग उड़ाने का आयोजन मकर संक्रांति से शुरू होता है, जो होली तक पूरे शबाब पर होता है लेकिन होलिका दहन से पूर्व विभिन्न चौराहों पर होलिका को लोग अपने-अपने घरों से लाई रंग-बिरंगी पतंगों से सजाते हैं और होलिका दहन के साथ पतंगों को भी अग्नि को समर्पित कर इस दिन से पतंग उड़ाना बंद कर देते हैं। 
 
इसी प्रकार पिछले तीन सौ सालों से बीकानेर में मनाई जा रही ‘डोलचीमार होली’ भी अपनी तरह का अनोखा आयोजन है। फाल्गुन शुक्ल द्वितीया को खेली जाने वाली इस होली का आयोजन बीकानेर के हर्षों के चौक में होता है, जहां पानी के बड़े-बड़े कड़ाहे भरकर रखे जाते हैं। खेल के दौरान करीब 750 मि.ली. क्षमता पानी वाली चमड़े की बनी डोलचियों का उपयोग होता है। इन डोलचियों से प्रतिद्वंद्वी एक-दूसरे पर पानी का इतना तेज प्रहार करते हैं कि देखकर रौंगटे खड़े हो जाएं।
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